अजब समाज है हमारा। इसमें स्त्रियों के लिए अलग नियम हैं पुरुषों के लिए अलग।
कुछ दशक पहले तक, जब स्त्रियाँ पूर्ण रुपेण अपने पति पर निर्भर होती थीं- आर्थिक और सामाजिक, दोनो ही रूप से, तो भी कोई नहीं सोचता था कि वह अकेली कैसे जीवन गुज़ारेगी? आज पढ़ी लिखी होने के बावजूद भी कितनी ऐसी हैं जो ठीक सी नौकरी पाकर अपना और बच्चा हो तो उसे भी, पाल सकें? उनकी फ़िक्र समाज ने कभी नहीं की। पर यदि अपनी ही इच्छा से अविवाहित रहना चाहे तो प्रश्न खड़ा हो जाता है क्या ‘अविवाहित रहना उनके लिए सही है?
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वैसे आप यह जान लें कि जो लड़कियाँ विवाह न लेने का निर्णय लेती हैं वह प्राय ही किसी अच्छी नौकरी पर किसी ऊँचे पद पर आसीन होती हैं। अथवा किसी सामाजिक कार्य में जुटी हुई होती हैं। घर बैठी लड़की के पास अपने जीवन सम्बंधी निर्णय लेने का हक़ ही कहाँ होता है? मेरी एक सखी है उसने विवाह नहीं किया पर किसी पर निर्भर रहने की बजाये वह उम्र भर औरों का सहारा बनती रही। पिता की मृत्यु के बाद माँ और छोटे भाई बहन को सहारा दिया। आर्थिक परेशानी नहीं थी बस विवाह न करने की ठानी। और पूरी उम्र एक स्वतंत्र जीवन जिया। बहुत सी सरकारी और अर्ध सरकारी समितियों से जुड़ी रहीं और सामाजिक कार्य करती रहीं। देश विदेश घूमी, कभी नौकरी के सिलसिले में कभी घूमने के लिए और ऊँचे पद से रिटायर हुईं।
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उसका मानना था कि "लड़कियाँ उतनी कमज़ोर होती नहीं, सुरक्षित जीवन देकर उन्हें कमज़ोर बना दिया जाता है।’ वह स्वयं किसी भी आकस्मिक समस्या से जूझ सकती थी। बड़ी बात यह कि हमारे सहशिक्षा वाले कॉलेज में वही लीडर हुआ करती थी।
आप स्वयं देख सकते है कि आज के सीमित परिवारों में जहाँ सिर्फ लड़कियाँ ही होती हैं वह घर की पूरी ज़िम्मेदारी उठा लेती हैं। बाहर के सब काम संभाल लेती हैं। मैने उन्हें अकेले अपने बूते पर मकान बनवाते देखा है- नक़्शा पास करवाने से लेकर, सीमेण्ट ईंटों का इन्तज़ाम करने तक।
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कुछ वह लड़कियाँ भी कुवारी रह जाती हैं जिनके लिए माता पिता दहेज नहीं जुटा सकते। यह हमारे समाज पर एक कलंक है कि दहेज के कारण लड़की का ब्याह नहीं हो पाता और दूसरा यह कि सामाजिक रूप से बेटियों का विवाह करना इतना आवश्यक क़रार दिया गया है कि अनेक बार आपको समाचार पत्र में इस तरह की ख़बर पढ़ने को मिल जायेगी कि-‘दहेज के कारण विवाह न हो पाने पर तीन बहनों ने आत्महत्या कर ली'। प्रश्न यह है कि ‘क्यों नहीं इन लड़कियों को पढ़ा कर आत्मनिर्भर बना दिया गया'?
तो जिस तरह पुरुषों के विवाह न करने पर कोई प्रश्न नहीं करता उसी तरह महिलाओं को भी अपनी इच्छानुसार जीवन जीने को छोड़ दीजिए न! क्योंकि जितनी ज़रूरत स्त्री को पुरुष की होती है, उतनी ही पुरुष को भी स्त्री की। ऐसा तो है नहीं कि पुरुष तो पूरी तरह आत्मनिर्भर हैं पर स्त्रियाँ अकेली नहीं जी सकतीं।
क्या एक महिला का जीवन भर अविवाहित रहना सही है?
Reviewed by Hindi khabar
on
December 09, 2019
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